पशुओं में वर्षा ऋतु के दौरान विभिन्न प्रकार के संक्रामक रोगो के होने की प्रबल सम्भवना रहती है जो कि पशुओं की उत्पादन क्षमता पर विपरीत प्रभाव डालतें है। पशु पालकों में इन रोगों एवं इनसे बचाव के उपायों का समुचित ज्ञान होना अतिआवश्यक है जिससे कि पशुओं को इन रोगों से बचाकर पशु पालन को आर्थिक रूप से सक्षम व्यवसाय के रूप स्थापित किया जा सके। वर्षा ऋतु में पशुओं में होने वाले प्रमुख रोग निम्नानुसार है।
- थनेला: थनेला रोग थनो की सूजन अथवा संक्रमण को कहते हैं। यह रोग मुख्यतः ज्यादा दूध देने वाली गायों/भैंसो में होता है। तथा बरसांत के मौसम में इसके होने की संभावना अधिक होती है। इस रोग के बचाव के लिये जरूरी है कि पशु को साफ एवं सूखे फर्ष पर रखा जाए् समय-समय पर चूने का छिड़काव करें मक्खियों पर नियत्रंण बहुत जरूरी है दूध दोहने से पहले थनो को खूब अच्छी तरह से साफ पानी से धोल लें। थर्मेला बीमारी से ग्रस्त थन का दूध अंत में दुहें तथा उसे उपयोग मेें न लायें। दूध दोहने के बाद थनो को कीटनाषक घोल में डुबोये या ऐसे घोल का स्प्रे करे। दूध दोहने के बाद थन की नली साफ कर दें ।
- गलघोंटू: यह जानलेवा संक्रामक रोग है जो प्रायः गायों और भैसों में वर्षा ऋतु में फैलता एवं इसमें मृत्यु दर अधिक होती है इस रोग की पहचान तेज बुखार् जबड़ो एवं गले के नीचे सूजन सांस लेने में कठिनाई के कारण घुर्र-घुर्र की आवाज होती है।
- लंगड़ा बुखार/चुरचुरिया: इस रोग का प्रकोप वर्षा ऋतु में अधिक होता है। इसके कीटाणु खाने के साथ या घाव के द्वारा ष्षरीर में घूसतें है। इस रोग के लक्षण अचानक तेज ज्वर (107-108 डिग्री) पिछले पुठ्ठे पर सूजन लगंड़ाना ् सूजन को दबाने पर चुर्र-चुर्र की आवाज आती है।
- खुरपका/मुहॅपका रोगः यह एक संक्रामक रोग है जो रोग ग्रस्त पशुओं से स्वस्थ पशुओं में केवल सम्पर्क से ही नहीं वरन् चारा’ दाना् पानी एवं हवा से भी फैलाता है। इसमेें मृत्यु की संम्भावना तो बहुत कम रहती है पर पशुओ की उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस रोग के तेज बुखार, मसूड़े, जीभ और खुरों पर छाले आना मुॅह से झागदार निकलना इत्यादि लक्षण पाये जातें है।
पशुओं को इन संक्रामक रोंगो से कैसे बचायेंः
- इन संक्रामक रोंगो से बचाने के लिये पशुओ का नियमित टीकाकरण जरूरी है। खुरपका या मुहॅपका रोग ् लंगड़ा बुखार एवं गलघोंटू से बचाव के लिये छः माह की उम्र मे तीनो रोगो का संयुक्त टीका लगवाना चाहिये तथा प्रत्येक वर्ष के अंतराल पर बूस्टर डोस लगवाना चाहिये। यह बीमारियां मुख्यतः वर्षा ऋतु में होती है। इसलिये गर्मी के मौसम में टीकाकरण का कार्य कर लेना चाहिये।
- बीमार जानवरो को स्वस्थ जानवरों से अलग कर् साफ सुथरी एवं सूखे स्थान में रखना चाहिये।
- यदि संक्रामक रोगों से पशु की मृत्यु होती है तो पशु को गहरा गढ्ढा खोदकर चूना डालकर गाड़ देना चाहिये।
- स्वस्थ पशुओं कों दिया जाने वाला आहार, पानी, चारा इत्यादि रोगी पशुओं से दूर रखे।
- पशु आवास को साफ-सुथरा रखें एवं पशुओं को मक्खियों के प्रकोप से बचायें।
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पशु प्रजनन, मादा रोग एवं प्रसूति विज्ञान विभाग, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ, उत्तर प्रदेश-250110
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सह-आचार्य, पशु मादा रोग एवं प्रसूति विज्ञान विभाग, पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय, सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ, उत्तर प्रदेश-250110
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एसोसिएट प्रोफेसर; डॉ राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा
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सहायक प्राध्यापक, पशु प्रजनन, मादा रोग एवं प्रसूति विज्ञान विभाग, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ, उत्तर प्रदेश-250110
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