प्रस्तावना
आज अगर भारतवर्ष विश्व भर में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में शीर्ष पर विराजमान है तो उसका एक अहम श्रेय भारत में दुधारू पशुओं की विशाल जनसंख्या को जाता है। इस विशाल पशुधन संख्या के साथ ही अनेकानेक रोग होने की विशाल संभावनाएं भी पैदा होती है। रोगों की बात करें तो सबसे भयावह नाम जो मस्तिष्क में आता है वो है कैंसर अथवा कर्करोग। सींग का कैंसर जिसे स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा भी कहा जाता है, एक प्रकार का त्वचा कैंसर है जो सींग के आधार, खासकर सींग और आँख के बीच के क्षेत्र में विकसित होता है। यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है लेकिन समय रहते इलाज न करने पर यह आसपास की हड्डियों, आंखों और मस्तिष्क तक फैल सकता है। इस रोग से न केवल पशुओं के सींग प्रभावित होते हैं अपितु दर्द और मानसिक असंतुलन के कारण दुग्ध उत्पादन एवं कार्यक्षमता में भी गिरावट आती है। इसके कारण पशुपालकों की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित हो सकती है। भैंसों के अपेक्षाकृत यह रोग 5-10 वर्ष की गायों में ज्यादा देखा जाता है। गाय और बैल में तुलना करें तो बैल इससे ज्यादा प्रभावित होते हैं। यह बीमारी खासकर गिर नस्ल के बैलों में अधिक पाई जाती है। समयकालिक निदान के पश्चातए शल्य चिकित्सा और दवाओं की सहायता से यह रोग जड़ से भी समाप्त किया जा सकता है।
संभावित कारण
विशेषज्ञों के मतानुसार, इस बीमारी का कोई स्पष्ट कारण या कारक नहीं है। यह जन्मजात और अर्जित दोनों कारण से हो सकती है।
जन्मजात कारण
त्वचा का रंग : वैज्ञानिकों के अनुसार हल्के रंग के जानवरों में यह ज्यादा पाया जाता है क्योंकि उनकी त्वचा धूप में मौजूद अत्यधिक यू वी किरणों के प्रति संवेदनशील होती है।
अर्जित कारण
सींग के पास घाव या फोड़ा होना जो ठीक नहीं होता: सींग के आधार के पास जूए की लगातार जलन या लगातार घर्षण। ऐसा लंबे समय तक होने से वहां का हिस्सा कमजोर हो जाता है और कोशिकाओं पर अधिक कार्य आने के कारण कैंसर का जन्म होता है।
चोट: अक्सर जब पशु आवेश में आकर दूसरे पशुओं पर आक्रमण करते हैं तो सींग के हिलने या टूटने की संभावना सर्वाधिक होती है। ऐसी स्थिति में कई बार लगी चोट को पशुपालक नजरअंदाज कर देते हैं और वो लंबे समय में संक्रमण या गंदगी के कारण कैंसर का रूप ले लेती है।
रसायन :कुछ रसायनों या दवाओं के कारण भी यह स्थिति पैदा हो सकती है।
लक्षण व संकेत
- प्रमुख लक्षणों में से एक है, सींग के पास कोई फोड़ा या घाव होना जो ठीक न हो रहा हो यह कैंसर हो सकता है। उस घाव से लगातार खून या मवाद का बहना भी ऐसा ही एक संकेत है।
- सींग का दुर्बल हो जाना, हिलने लगना, खोखला मालूम पड़ना, उसमें से दुर्गंध आना आदि। पशु सिर हिलाने में या खुरचने में असहजता दिखाता है।
- पशु द्वारा चारा कम खाना या चारा चबाने में परेशानी होना।
- आंखों से पानी गिरना, आंखों में सूजन आना या अंधापन महसूस होना इत्यादि।
इन सभी लक्षणों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और पशुचिकित्सक से शीघ्रता से संपर्क करना चाहिए।

निदान
- शल्यक्रिया: संक्रमित सींग और आसपास की ऊतक को हटा दिया जाता है ।
- एंटीबायोटिक और दर्दनाशक दवाएं संक्रमण और दर्द के लिए ।
- घाव की सफाई और ड्रेसिंग नियमित रूप से की जानी चाहिये।
अगर इलाज संभव न हो तो उन्नत मामलों में पशु को मुक्त करने की सलाह दी जा सकती है समयकालिक निदान ही रोकथाम का सबसे बेहतर उपाय है। लक्षणों और संकेतों पर गौर करने से यह कार्य सुगम हो जाता है। अन्य जांचों के द्वारा इसको प्रमाणित भी किया जा सकता है जिनमें सर्वप्रथम है फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी इसमें प्रभावित अंग से एक इंजेक्शन के माध्यम से कोशिकाओं को निकाला जाता है और फिर माइक्रोस्कोप के माध्यम से किसी प्रकार के विकार के लिए उनकी जांच की जाती है। दूसरी जांच का नाम है हिस्टोपैथोलॉजीए इसमें कोशिकाओं की जगह पर ऊतक का एक नमूना लेकर उसकी जांच की जाती है। कैंसर की पुष्टि हो जाने पर हिस्टोपैथोलॉजी के माध्यम से यह पता किया जा सकता है कैंसर कितनी गहराई तक फैला हुआ है।
उपचार
प्रारंभिक अवस्था में निदान हो जाने पर शल्य चिकित्सा अथवा सर्जरी के माध्यम से प्रभावित सींग को काटकर कैंसर को निकाला जा सकता है। यदि रोग अंदर ही अंदर आंखों तक फैल गया हो तो पशु का जीवन बचाने के लिए आंखे भी निकालनी पड़ सकती है। सर्जरी के पश्चात रसायनोपचार अथवा कीमोथेरेपी एवं रेडियोथेरेपी के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि कैंसर शरीर के और किसी अंग में न फैले हालांकि यह सुविधाएं अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं होती हैं। इसके साथ साथ एंटीबायोटिक्सए विटामिन्स एवं मिनरल्स का भी रोगोपचार में प्रयोग किया जाता है ताकि घाव को जल्दी से जल्दी भरा जा सके और वहां कोई और रोगाणु संक्रमण न पनपने पाए।

रोकथाम एवं बचाव
- चूंकि यह रोग हल्के रंग के पशुओं में अधिक देखने को मिलता हैए सभी पशुपालक यह सुनिश्चित करें कि ऐसे पशुओं को ज्यादा देर धूप में न रखें, छांव या ठंडे स्थान पर ही रखें। सींग में किसी भी प्रकार की चोट लगने पर उसे नजरअंदाज न करें तथा तुरंत नजदीकी पशुचिकित्सालय जाकर उपचार कराएं।
- पशु के आस पास के वातावरण में साफ सफाई का ध्यान रखें।
- सींग पर गंदगी जमा न होने दें।
- पशुचिकित्सक द्वारा समय समय पर अपने पशु की नियमित जांच कराते रहें।
- संक्रमित पशुओं को अलग रखें ए युवा लंबे सींग वाले पशुओं, विशेषकर जिनके परिवार में सींग कैंसर का इतिहास रहा हो, सींग काटना संभवतः सबसे विश्वसनीय उपाय है।
निष्कर्ष
हॉर्न कैंसर शुरुआती अवस्था में पहचान लेने पर पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। देरी से इलाज कराने पर संक्रमण फैल सकता है और पशु के जीवन के लिए खतरा बन सकता है। सींग का कैंसर एक गंभीर परन्तु रोकथाम योग्य रोग है। इससे प्रभावित पशु की उत्पादन क्षमता तो घटती ही है इसके इलावा इलाज पर जो अधिक खर्चा आता है वो पशुपालकों को दो धारी तलवार के समान हानि पहुंचाता है। अगर दुर्भाग्यवश पशु की मृत्यु हो जाए तब जो भारी नुकसान पशुपालकों को झेलना पड़ता है वो मार्मिक है। इसीलिए यदि प्रारंभिक अवस्था में पता चल जाए और सही उपचार चले तो पशु को शारीरिक पीड़ा से एवं पालक को आर्थिक पीड़ा से बचाया जा सकता है। जागरूकताए स्वच्छता और समयकालिक चिकित्सा सहायता ही इस बीमारी से बचाव के प्रमुख उपाय हैं।


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