ब्रुसेलोसिस संक्रमण द्वारा पशुओं में गर्भपात एवं अन्य प्रजनन रोग

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ब्रुसेलोसिस पशुओं एवं मनुष्यों दोनों में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण जीवाणुजनित रोग है। यह मुख्यतः प्रजनन तंत्र को प्रभावित करता है तथा पशुओं में गर्भपात, बांझपन एवं अन्य प्रजनन संबंधी समस्याओं का प्रमुख कारण बनता है। यह रोग विशेष रूप से बड़े डेयरी फार्मों एवं संगठित पशुपालन इकाइयों में अधिक देखने को मिलता है। संक्रमित सांड के वीर्य, रोगग्रस्त पशुओं के कच्चे दूध, गर्भपात के बाद निकलने वाले भ्रूण एवं झिल्लियों, जननांग स्राव तथा दूषित चारा, पानी और वातावरण के संपर्क से इसका संक्रमण तेजी से फैल सकता है।

महत्व

ब्रुसेलोसिस विश्वभर में पशुपालन एवं जनस्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रोग है। अनुमानतः प्रतिवर्ष लगभग 5 लाख लोग इस रोग से संक्रमित होते हैं। भारत में भी यह रोग पशुपालन क्षेत्र को गंभीर आर्थिक क्षति पहुँचाता है तथा प्रतिवर्ष लगभग 35 करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है। देश में लगभग 8 से 10 प्रतिशत पशु किसी न किसी स्तर पर इस संक्रमण से प्रभावित पाए जाते हैं।

रोग का कारण एवं संक्रमण का प्रसार

यह रोग ब्रूसेला नामक जीवाणु के कारण होता है, जो संक्रमित पशुओं के वीर्य, दूध तथा जननांग स्राव में पाया जाता है।

पशुओं में संक्रमण के प्रमुख स्रोत

  1. दूषित चारा, पानी एवं आहार का सेवन।
  2. संक्रमित पशुओं के मल, मूत्र, जननांग स्राव, गर्भपात हुए भ्रूण तथा झिल्लियों के संपर्क में आना।
  3. संक्रमित पशु का कच्चा दूध पिलाना।
  4. संक्रमित सांड के वीर्य द्वारा प्राकृतिक या कृत्रिम गर्भाधान कराना।

मनुष्यों में संक्रमण के प्रमुख स्रोत

  1. कच्चे या बिना पाश्चुरीकृत दूध एवं दुग्ध उत्पादों का सेवन।
  2. संक्रमित पशुओं या उनके स्राव, भ्रूण एवं झिल्लियों को बिना सुरक्षा उपकरणों के संभालना।
  3. दूषित वातावरण, भोजन अथवा पानी के संपर्क में आना।

प्रमुख लक्षण

पशुओं में

  1. गर्भावस्था के अंतिम चरण (लगभग 6 से 9 माह) में गर्भपात।
  2. जेर का न निकलना।
  3. गर्भाशय एवं अंडकोष में सूजन।
  4. जोड़ों में दर्द एवं सूजन।
  5. दुग्ध ग्रंथि (थन) में संक्रमण या सूजन।
  6. प्रजनन क्षमता में कमी एवं बार-बार गर्भधारण में असफलता।
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मनुष्यों में

  1. रुक-रुक कर तेज बुखार आना।
  2. अत्यधिक पसीना आना, जिसमें विशिष्ट दुर्गंध हो सकती है।
  3. कमर एवं जोड़ों में लगातार दर्द।
  4. कमजोरी एवं थकान।
  5. पुरुषों में अंडकोष की सूजन जैसी समस्याएँ भी देखी जा सकती हैं।

रोग का निदान

ब्रुसेलोसिस की पुष्टि केवल प्रयोगशाला परीक्षणों द्वारा की जाती है। इसके लिए वीर्य, जननांग स्राव, दूध अथवा रक्त (सीरम) के नमूनों की जांच रोज बंगाल प्लेट टेस्ट, सीएफटी, एलिसा तथा पीसीआर जैसी आधुनिक तकनीकों से की जाती है।

ब्रुसेलोसिस की रोकथाम एवं बचाव

पशुओं में बचाव

ब्रुसेलोसिस की रोकथाम उपचार की अपेक्षा अधिक प्रभावी एवं किफायती है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय अपनाने चाहिए।

  1. कृत्रिम गर्भाधान के लिए केवल प्रमाणित एवं रोगमुक्त सांडों के वीर्य का उपयोग करें।
  2. बछियों का 3 से 6 माह की आयु में ब्रुसेलोसिस के विरुद्ध अनुशंसित टीकों (जैसे स्ट्रेन.19 और आरबी51) से टीकाकरण कराएं।
  3. नए खरीदे गए पशुओं को पहले ब्रुसेलोसिस की जांच कराएं तथा पुष्टि होने तक उन्हें अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग रखें।
  4. डेयरी फार्म में समय-समय पर पशुओं के रक्त अथवा दूध की ब्रुसेलोसिस जांच कराते रहें।
  5. पशुशाला की नियमित सफाई एवं फिनाइल या लाइसोल जैसे उपयुक्त कीटाणुनाशकों से विसंक्रमण करें।
  6. गर्भपात हुए भ्रूण, झिल्लियों तथा मृत नवजात पशुओं का सुरक्षित एवं वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करें।
  7. गर्भपात वाले स्थान को तुरंत कीटाणुनाशक घोल से अच्छी तरह साफ करें।
  8. संक्रमित पशु का कच्चा दूध अन्य पशुओं या नवजात बछड़ों को न पिलाएं।
  9. गर्भपात की सामग्री एवं मृत नवजात को कुत्तों तथा अन्य जानवरों की पहुँच से दूर रखें।
  10. स्वस्थ एवं संक्रमित पशुओं को अलग-अलग स्थान पर रखें।
  11. गंभीर रूप से संक्रमित पशुओं के संबंध में पशुचिकित्सक की सलाह अनुसार उचित प्रबंधन अपनाएं।
  12. संक्रमित पशुओं की देखभाल करने वाले व्यक्ति पहले स्वस्थ पशुओं का कार्य पूरा करें तथा बाद में संक्रमित पशुओं की देखभाल करें। कार्य समाप्त होने पर हाथ, कपड़े एवं उपकरणों को अच्छी तरह कीटाणुरहित करें।

मनुष्यों में बचाव

  1. वर्तमान में मनुष्यों के लिए ब्रुसेलोसिस का व्यापक टीका उपलब्ध नहीं है, इसलिए जागरूकता एवं सावधानी ही सबसे प्रभावी बचाव है।
  2. कच्चे या बिना पाश्चुरीकृत दूध एवं उससे बने उत्पादों का सेवन न करें।
  3. गर्भपात हुए भ्रूण, झिल्लियों या संक्रमित पशुओं को बिना दस्ताने या सुरक्षा उपकरणों के न छुएँ
  4. गर्भपात से संबंधित सभी अवशेषों का सुरक्षित निस्तारण करें।
  5. संक्रमित स्थान, उपकरण एवं हाथों को उचित कीटाणुनाशकों से अच्छी तरह साफ करें।
  6. पशुशालाओं एवं बूचड़खानों में कार्य करते समय दस्ताने, मास्क, चश्मा एवं अन्य व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण का उपयोग करें।
  7. यदि ब्रुसेलोसिस संक्रमण की आशंका हो तो तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लें तथा आवश्यकतानुसार रक्त, दूध, वीर्य अथवा जननांग स्राव की प्रयोगशाला जांच कराएं।
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निष्कर्ष

ब्रुसेलोसिस एक गंभीर पशुजन्य रोग है, जो पशुओं की प्रजनन क्षमता, दुग्ध उत्पादन तथा किसानों की आय को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। साथ ही यह मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण जोखिम उत्पन्न करता है। नियमित टीकाकरण, जैव-सुरक्षा उपायों का पालन, स्वच्छ प्रबंधन, समय पर रोग की पहचान तथा संक्रमित पशुओं का उचित प्रबंधन अपनाकर इस रोग की रोकथाम प्रभावी रूप से की जा सकती है।

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