विभिन्न विषों से, विषाक्त पशुओं के लक्षण तथा उपचार
सायनाइड विषाक्तता- यह विषाक्तता, हाइड्रोसानिक एसिड(HCN) तथा साइनोजेनेटिक पौधों जैसे ज्वार, बाजरा, अलसी सूडान घास तथा मक्का आदि को सूखे की स्थिति में खा लेने से उत्पन्न होती है । ऐसे पेड़ >>>
सायनाइड विषाक्तता- यह विषाक्तता, हाइड्रोसानिक एसिड(HCN) तथा साइनोजेनेटिक पौधों जैसे ज्वार, बाजरा, अलसी सूडान घास तथा मक्का आदि को सूखे की स्थिति में खा लेने से उत्पन्न होती है । ऐसे पेड़ >>>
पशुओं में अनु उत्पादकता एवं कम उत्पादकता के लिए निम्नलिखित कारक मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं: – संरचनात्मक विकार रोगों के कारण उत्पन्न विकार हार्मोनल विकार पोषण से संबंधित विकार आकस्मिक >>>
पशुपालन कृषि का एक अभिन्न अंग होने के साथ-साथ लघु एवं सीमांत किसानों की आय का प्रमुख स्रोत है जोकि उनके सामाजिक एवं आर्थिक आस्तित्व का आधार हैं। परन्तु पशुओं में प्रसव के उपरांत होने वाली कुछ समस्या >>>
पशुधन का भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान हैं जिनमे भैंसों का एक विशेष स्थान है। विश्व के सम्पूर्ण भैंसों की संख्या का आधा हिस्सा भारत में पाई जाती हैं। >>>
अपने देश भारत में पशुओं की छोटी बड़ी बीमारियों में पशु पालकों द्वारा बांस की नाल, रबड़ की नली, लकड़ी या कांच की बोतल इत्यादि के द्वारा देसी दवाइयां पिलाना एक आम बात है। >>>
थनैला रोग मुख्य रूप से जीवाणु जनित होता है परंतु भारत में कभी-कभी गाय एवं भैंस मैं कवक के द्वारा भी थनैला रोग हो जाता है। >>>
एवियन इनफ्लुएंजा/ बर्ड फ्लू स्वाइन फ्लू एवं रेबीज इत्यादि विभिन्न ऐसे संक्रामक रोग है जो कि पशुओं से मनुष्यों में फैलते हैं इस प्रकार से पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाले रोगों को पशु जन्य रोग या जूनोटिक रोग कहते हैं। >>>
थनैला दुधारू गाय, भैंस एवं बकरी के अयन की एक मुख्य संक्रामक बीमारी है। जिन देशों में डेरी व्यवसाय बहुत उन्नतशील होता है वहां इस रोग से अधिक हानि होती है। >>>
यह लगभग सभी पशुओं में पाया जाने वाला अति गंभीर संक्रामक रोग है। जो ट्रिपैनोसोमा इवेनसाई नामक प्रोटोजोआ के कारण फैलता है। इस रोग में रोगी को तीव्र बुखार, रक्ताल्पता अर्थात एनीमिया व पशु शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो जाता है। >>>
यह मुख्य रूप से गाय व सूअरों अब तो एवं कुत्तों में जीवाणु जनित रोग है इसके अतिरिक्त मनुष्यों में भी पाया जाने वाला संक्रामक रोग है। जंगली पशु तथा भेड़ इससे बहुत कम प्रभावित होते हैं। >>>
भारत देश दुग्ध उत्पादन में विगत कई वर्षों से विश्व में प्रथम स्थान पर है परंतु हमारे देश में प्रति पशु उत्पादकता अत्याधिक न्यून है। किसी भी पशु की उत्पादकता को कायम रखने के लिए उसका स्वस्थ होना अपरिहार्य है। >>>
बदले हुए मौसम में चारे तथा अन्य घासों की उपलब्धि एवं उनके प्रकार पर अपच का होना निर्भर है । यदि अधिक अम्लीय या अधिक क्षारीय गुण वाले चारे खिलाये जाए तो अपच हो जाता है। >>>
डेयरी पशुओं में पशुओं की प्रजनन क्षमता पशुपालकों की आय का प्रमुख निर्धारक है जिसका आंकलन डेयरी पशुओं में मादा द्वारा प्रतिवर्ष एक संतान पैदा करने की क्षमता से किया जाता है। >>>
‘ईलाज से परहेज अच्छा’, लोकोक्ति ये हम सभी भली–भांति परिचित हैं। हम सभी एक अन्य लोकोक्ति ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियां चुग गई खेत’ से भी परिचित हैं। >>>