पशुओं की बीमारियाँ

असामान्य या कठिन प्रसव (डिस्टोकिया) के कारण एवं उसका उपचार

ब्याने के समय मां स्वयं बच्चे को बाहर नहीं निकाल पाए और बच्चा बीच में ही फंस जाए तो इसे कठिन प्रसव (Dystocia) कहते हैं। ब्याने की तीन अवस्थाएं होती हैं >>>

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पालतू पशुओं में मुख्य विषाक्तताओं के कारण एवं निवारण

जब किसी स्वस्थ पशु की आकस्मिक मृत्यु होती है तो उसमें विषाक्तता का संदेह उत्पन्न होता है। यह विषाक्तता कोई जहरीला रसायन खाने से अथवा चारे के साथ जहरीले पौधे खाने से होता है। पशुपालकों को मुख्य विषाक्तताओं की जानकारी होना आवश्यक है ताकि वे अपने पशुओं का इनसे बचाव कर सकें। >>>

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कुत्तों में बबेसियोसिस रोग के कारण, लक्षण एवं उपचार

कुत्तों में बबेसियोसिस, रोग किलनी बुखार के नाम से भी प्रसिद्ध है, जो कुत्तों के रक्त के लाल रक्त कणों में रक्त प्रोटोजोआ की उपस्थिति के कारण होता है। >>>

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पशुओं में होने वाले दुग्ध ज्वर के कारण, लक्षण, उपचार एवं बचाव

दुग्ध ज्वर एक चपापचई रोग है जो गाय भैंस में ब्याने के 2 से 3 दिनों के अंदर ही होता है परंतु ब्याने के पूर्व या अधिकतम उत्पादन के समय भी हो सकता है। पशु के रक्त में और मांसपेशियों में कैल्शियम की भारी कमी इसका मुख्य कारण होता है। शरीर में रक्त का प्रवाह काफी कम व धीमा हो जाता है अंत में पशु काफी सुस्त होकर लगभग बेहोशी की अवस्था में चला जाता है। >>>

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गाय की चेचक/ माता/ गो मसूरी, कारण, लक्षण एवं बचाव

इस बीमारी को वैक्सीनिया या वेरीओला भी कहते हैं। यह एक घातक, संक्रामक  एवं छूत का रोग है। यह प्रायः  दूध देने वाली  गायों  एवं भैंसों में अधिक पाया जाता है इस रोग में शरीर की त्वचा पर विशेष प्रकार के फफोले उत्पन्न हो जाते हैं और थन तथा अयन पर दाने निकल आते हैं जो बाद में फूटकर घाव बन जाते हैं। >>>

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राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP) का उद्देश्य, पशुपालकों की आमदनी दोगुना करना

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 11 सितंबर 2019 को उत्तर प्रदेश के पंडित दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय  एवं गो-अनुसंधान संस्थान मथुरा में  राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम का इस उद्देश्य के साथ शुभारंभ किया था, कि खुरपका मुंह पका रोग अर्थात एफएमडी और संक्रामक गर्भपात अर्थात ब्रूसेलोसिस जैसी पशुओं की अति खतरनाक बीमारियों का समूल उन्मूलन किया जा सके। >>>

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रक्तमूत्रमेह: पर्वतीय क्षेत्र के गौवंशीय पशुयों की एक गंभीर बीमारी

ये पशु एक असंक्रामक, किन्तु चिरकारी रोग जिसे ‘रक्तमूत्रमेह’ या ‘हिमेचूरिया’ कहते हैं, का शिकार हो रहे हैं। यह रोग 4-5 वर्ष से अधिक की आयु वाले वयस्क और वृद्ध >>>

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रक्त परजीवी रोगों की रोकथाम व उपचार

रक्त परजीवी पशुयों को शारीरिक रूप से कमजोर करके उनकी उत्पादन तथा कार्यक्षमता को कम कर देते हैं।   यदि समय पर इलाज न कराया जाए तो पशुयों की मृत्यु भी हो जाती है। कुछ रक्त परजीवी तो बहुत ही घातक होते है, जिनके संक्रमण से पशुयों की मृत्युदर बहुत होती है। >>>

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नेजल सिस्टोसोमोसिस रोग- एक परिचय

नेजल सिसटोसोमोसिस या नेजल ग्रेनुलोमा या नकरा रोग, सिस्टोसोमा नेजेली नामक चपटा कृमि के कारण होता है। इस कृमि को खूनी फ्लूक भी कहा जाता हैं क्योंकि सिस्टोसोमा नेजेली कृमि प्रभावित पशुओं की नाक की शिरा में रहता है। इस रोग का प्रकोप गाय एवं बैल में, भैंस की अपेक्षा अधिक होता है। >>>

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बकरी की बीमारी- पी.पी.आर. महामारी

भारत वर्ष में बकरी पालन खासकर गरीब तथा सीमान्त पशुपालकों के लिए जीविका के प्रमुख साधन है। इसे लोग ए.टी.एम. की तरह उपयोग करते हैं, अर्थात जब भी किसान बन्धु को पैसे की जरूरत पड़ती है उसे उसी समय बेचकर पैसे प्राप्त कर लेते हैं। किसानों को बकरी बेचने के लिए कोई बाजार की आवश्यकता नहीं होती है। >>>

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बाढ़ की विभीषिका के बाद पशुओं में होने वाले रोग एवं उनसे बचाव

बाढ़ की विभीषिका अब प्रति वर्ष बिहार के लिए पर्याय बन गई है जो प्रति वर्ष बिहार के किसी न किसी हिस्से को तबाह कर रही है। इस वर्ष भी बाढ़ गंगा एवं अन्य नदियों के तटवर्ती बिहार के सभी जिलों में भयावह रूप लेकर आई है। तटवर्ती जिलों की आधी से अधिक आबादी और पशु बाढ़ से प्रभावित हैं। बाढ़ के समय पशुओं को बचाने के प्रयास किए गए हैं परन्तु बाढ़ के उपरान्त पशुओं में अनेक बिमारियों के होने की संभावना बनी रहती है। >>>

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रिपीट ब्रीडिंग (बार बार गाभिन कराने पर भी गर्भ न रुकना)

भारत एक कृषि प्रधान देश है। जिसने कृषि के साथ-साथ पशुपालन को एक संलग्न व्यवसाय के रूप में अपना रखा है। निरन्तर जनसंख्या बढने के कारण मानव जाति जंगलों को काटकर तथा कृषि योग्य भूमि मे घर बनाकर रहना शुुरु कर दिया है। >>>

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पशुओं में पीछा (शरीर) दिखाने की समस्या

मादा पशुओं में प्रजनन अंगों के योनि द्वार से बाहर आने से पशु एवं पशुपालकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। शाब्दिक भाषा में इस समस्या को योनिभ्रंश कहते हैं, जबकि आम बोल-चाल की भाषा में फूल दिखाना, पीछा दिखाना, शरीर दिखाना, गात दिखाना इत्यादि नामों से जाना जाता है। >>>

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दुधारू पशुओं में ऋतुचक्र की समस्या: निदान एवं उपचार

हमारे देश की 60 से 70% आबादी कृषि एवं इनके सहायक उद्योगों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुडी हुई हैं। पशु पालन कृषि का एक अभिन्न अंग है एवं यह किसानों की रीढ़ की हड्डी  है। अगर किसान पशु पालन को कृषि के साथ -साथ एक इकाई के रूप में रखता है तो वह अति विषम परिस्थितियो का भी सामना कर सकता है। पशु पालक अपने पशुओं की प्रजनन क्षमता पर पूरी तरह से निर्भर रहता है। >>>